मध्य प्रदेश में सड़क सुरक्षा को मजबूत करने के लिए सरकार नई तकनीक के इस्तेमाल की तैयारी कर रही है। प्रदेश में एक पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया जाएगा, जिसके तहत पेट्रोल पंपों पर आने वाले वाहनों की नंबर प्लेट कैमरे से स्कैन कर उनके इंश्योरेंस की स्थिति जांचने की व्यवस्था बनाई जाएगी। यदि वाहन का बीमा वैध नहीं पाया जाता है, तो ऐसे वाहन को ईंधन देने पर रोक लगाने की योजना पर काम किया जा रहा है।
पेट्रोल पंप पर कैमरा बताएगा वाहन का इंश्योरेंस स्टेटस
इस व्यवस्था के लिए पेट्रोल पंपों पर विशेष कैमरे लगाए जाने की तैयारी है। ये कैमरे वाहन की नंबर प्लेट को पहचानकर संबंधित जानकारी वाहन पोर्टल के डेटाबेस से मिलाने में मदद करेंगे। इसका उद्देश्य ऐसे वाहनों की पहचान करना है जिनका अनिवार्य मोटर इंश्योरेंस समाप्त हो चुका है। शुरुआती चरण में इस व्यवस्था को उस जिले में आजमाया जाएगा, जहां बिना बीमा वाले वाहनों की संख्या अधिक है। पायलट प्रोजेक्ट के परिणाम देखने के बाद इसे दूसरे जिलों तक बढ़ाया जा सकता है।
भोपाल, इंदौर और उज्जैन भी जीरो फैटेलिटी अभियान में शामिल
प्रदेश में सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों को कम करने के लिए चल रहे ‘जीरो फैटेलिटी’ कार्यक्रम का दायरा भी बढ़ाया गया है। पहले इस अभियान में धार, सतना, रीवा, सागर, जबलपुर और खरगोन जैसे जिले शामिल थे। अब भोपाल, इंदौर और उज्जैन को भी इस कार्यक्रम में जोड़ा गया है। सरकार सड़क सुरक्षा से जुड़े कामों के लिए बजट के साथ-साथ तकनीकी संसाधनों और सीएसआर के माध्यम से मिलने वाली सहायता का इस्तेमाल करने की योजना बना रही है।
सड़क हादसों को रोकने के लिए स्थानीय लोगों की भागीदारी पर जोर
बैठक में सड़क दुर्घटनाओं को कम करने के लिए केवल नियमों की सख्ती के बजाय आम लोगों की भागीदारी बढ़ाने पर भी जोर दिया गया। दुर्घटना संभावित स्थानों की पहचान करके वहां सुधारात्मक कदम उठाने और स्थानीय स्तर पर प्रभावी एक्शन प्लान तैयार करने की बात कही गई है। इसके साथ ही सड़कों पर आवारा पशुओं की मौजूदगी के कारण होने वाले हादसों को रोकने के लिए भी समयबद्ध कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए हैं।
हादसे के बाद घायलों को जल्द अस्पताल पहुंचाने की तैयारी
सड़क सुरक्षा की योजना में दुर्घटना के बाद घायल व्यक्ति को जल्द चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराना भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। वर्तमान में शहरी इलाकों में हादसे के बाद घायल को अस्पताल तक पहुंचाने में औसतन करीब 16 मिनट लगते हैं। प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग इस रिस्पांस टाइम को और कम करने की दिशा में काम कर रहे हैं, ताकि दुर्घटना के बाद पीड़ितों को समय पर उपचार मिल सके।










