MP High Court का बड़ा फैसला: बालिग युवती अपनी इच्छा से बन सकती है जैन साध्वी, परिवार नहीं लगा सकता रोक

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धार्मिक जीवन चुनने की स्वतंत्रता पर कोर्ट ने दिया अहम फैसला

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने एक 20 वर्षीय जैन युवती की याचिका पर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि 18 वर्ष की आयु पूरी कर चुका व्यक्ति अपने जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण फैसले खुद लेने के लिए स्वतंत्र है। अदालत ने स्पष्ट किया कि कोई बालिग व्यक्ति अपनी इच्छा के अनुसार धार्मिक जीवन अपनाना चाहता है या सांसारिक जीवन का त्याग करना चाहता है, तो केवल पारिवारिक असहमति के आधार पर उसे रोका नहीं जा सकता। मामले में कोर्ट ने युवती की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पुलिस को भी आवश्यक निर्देश दिए हैं।

परिवार के विरोध के बाद हाई कोर्ट पहुंची युवती

इंदौर के महालक्ष्मी नगर क्षेत्र की रहने वाली इस युवती ने कोर्ट में याचिका दायर कर बताया था कि वह श्वेतांबर जैन धर्म के सिद्धांतों से प्रभावित है और दीक्षा लेकर साध्वी के रूप में जीवन बिताने का निर्णय ले चुकी है। हालांकि, उसके माता-पिता और कुछ अन्य परिजन उसके इस फैसले से सहमत नहीं थे। युवती के अनुसार परिवार की ओर से उसके निर्णय का विरोध किया जा रहा था और उसे घर तक सीमित रखने की स्थिति भी बनी। उसे आशंका थी कि दीक्षा लेने की प्रक्रिया में परिजन बाधा डाल सकते हैं।

कोर्ट ने धार्मिक पसंद और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को माना अहम

युवती ने अपनी याचिका में अदालत से अपनी जान-माल की सुरक्षा के साथ-साथ धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा की मांग की थी। उसने यह भी आग्रह किया था कि दीक्षा की प्रक्रिया में सहयोग करने वाले जैन आचार्यों, संतों और अन्य धार्मिक लोगों के खिलाफ परिवार की ओर से झूठी शिकायत या पुलिस कार्रवाई का सहारा न लिया जाए। हाई कोर्ट ने मामले की परिस्थितियों को गंभीरता से लेते हुए कहा कि बालिग व्यक्ति के मौलिक और कानूनी अधिकारों की रक्षा करना जरूरी है।

माता-पिता की भावनाओं को समझते हुए भी कोर्ट ने अधिकार स्पष्ट किए

अदालत ने कहा कि माता-पिता का अपनी बेटी के प्रति लगाव स्वाभाविक है और उसके जीवन के इतने बड़े फैसले को लेकर उनकी चिंता को समझा जा सकता है। लेकिन केवल भावनात्मक लगाव या पारिवारिक असहमति के आधार पर किसी बालिग व्यक्ति के कानूनी अधिकारों पर रोक नहीं लगाई जा सकती। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पहले के फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि वयस्क व्यक्ति को अपने जीवन की दिशा और धार्मिक मार्ग चुनने की स्वतंत्रता प्राप्त है।

सुरक्षा के लिए पुलिस को दिए निर्देश

हाई कोर्ट ने युवती को निर्देश दिया कि यदि उसे किसी प्रकार का दबाव या खतरा महसूस होता है तो वह संबंधित पुलिस अधीक्षक या थाना प्रभारी के समक्ष आवेदन दे सकती है। पुलिस अधिकारियों को ऐसे आवेदन पर सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुसार तत्काल आवश्यक कदम उठाने के निर्देश दिए गए हैं। इस फैसले के साथ अदालत ने साफ कर दिया कि किसी बालिग व्यक्ति के स्वतंत्र निर्णय में केवल पारिवारिक विरोध के आधार पर कानूनी बाधा खड़ी नहीं की जा सकती।

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