इंदौर में राजसी अंदाज में निकली मां अहिल्या की पालकी, शंखनाद से गूंजा शहर; 13 घोड़ों पर दिखा होलकर काल का गौरव

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इंदौर। लोकमाता देवी अहिल्याबाई होलकर की 231वीं पुण्यतिथि के अवसर पर गुरुवार को इंदौर में भव्य पालकी यात्रा निकाली गई। गांधी हॉल से शुरू हुई इस यात्रा में श्रद्धा, संस्कृति और शौर्य का अनूठा संगम देखने को मिला। जगह-जगह हुए स्वागत, शंखनाद, भजन, लोकनृत्य और पारंपरिक प्रस्तुतियों ने पूरे यात्रा मार्ग को उत्सवमय बना दिया। बड़ी संख्या में समाजों और संगठनों ने इसमें भाग लेकर लोकमाता के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त की।

गांधी हॉल से शुरू हुई यात्रा, राजसी रूप में नजर आया होलकर वैभव

देवी अहिल्या उत्सव समिति की ओर से आयोजित पालकी यात्रा में माता अहिल्याबाई की प्रतिमा को विधि-विधान से पूजन के बाद पालकी में विराजित किया गया। इसके बाद पुलिस बैंड की सलामी के साथ यात्रा आगे बढ़ी। समिति के आयोजन में विभिन्न समाजों की सक्रिय भागीदारी रही। राजसी वेशभूषा में घोड़ों पर सवार 13 युवतियों ने होलकर राजवंश के शासकों के प्रतिरूप के रूप में हिस्सा लिया, जबकि एक बालिका अहिल्याबाई के स्वरूप में बग्गी पर सवार रही। इस दृश्य ने लोगों का विशेष ध्यान आकर्षित किया और इंदौर के होलकर इतिहास की झलक दिखाई।

शंखनाद, भजन और लोककलाओं ने बढ़ाया आयोजन का आकर्षण

पालकी यात्रा में देश की विविध सांस्कृतिक परंपराओं की झलक भी दिखाई दी। 100 से अधिक बंगाली महिलाओं ने पारंपरिक वेशभूषा में शंखनाद कर यात्रा का स्वागत किया। सिख समाज की गटका टीम ने पारंपरिक युद्धकला का प्रदर्शन किया, जबकि दुर्गा वाहिनी की युवतियों ने शस्त्र प्रदर्शन किया। बंजारा समाज के कलाकारों ने लोकनृत्य प्रस्तुत किए और मराठी समाज की कई भजन मंडलियों ने पारंपरिक भजनों से माहौल भक्तिमय बनाए रखा। बोहरा समाज के बैंड ने भी अपनी प्रस्तुति से लोगों का ध्यान खींचा। विद्याधाम और आर्य समाज से जुड़े बटुकों ने मंत्रोच्चार करते हुए यात्रा की धार्मिक गरिमा बढ़ाई।

111 साल पुरानी परंपरा को आगे बढ़ा रहा कहार समाज

इस पालकी यात्रा से जुड़ी सबसे खास परंपराओं में कहार समाज की सेवा भी शामिल है। पिछले 111 वर्षों से समाज के सदस्य देवी अहिल्या की पालकी को अपने कंधों पर उठाते आ रहे हैं। इस वर्ष भी समाज की सातवीं पीढ़ी ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया। यात्रा गांधी हॉल से होते हुए शहर के प्रमुख मार्गों से गुजरी और गोपाल मंदिर तक पहुंची। रास्ते में कुल 29 स्थानों पर विभिन्न समाजों और संगठनों की ओर से पालकी का स्वागत किया गया।

गोपाल मंदिर में पूजा और आरती के साथ हुआ समापन

पालकी यात्रा के गोपाल मंदिर पहुंचने के बाद स्वागत, पूजन और आरती का आयोजन हुआ। इसके बाद श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरित किया गया। वहीं राजवाड़ा स्थित अहिल्या उद्यान में भी देवी अहिल्याबाई की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर उन्हें श्रद्धांजलि दी गई। शहर के अन्य प्रमुख मंदिरों में भी पुण्यतिथि के अवसर पर धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए गए। इस पूरे आयोजन में इंदौर की ऐतिहासिक विरासत, धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक विविधता एक साथ दिखाई दी।

आयोजन में दिखी शहर की सामूहिक भागीदारी

पालकी यात्रा में 30 से अधिक समाजों की सहभागिता रही। अलग-अलग समुदायों ने झांकियों, संगीत, नृत्य और धार्मिक प्रस्तुतियों के जरिए देवी अहिल्याबाई के जीवन और उनके योगदान को याद किया। यात्रा के दौरान बड़ी संख्या में लोग मार्ग के दोनों ओर मौजूद रहे और पालकी के दर्शन किए। आयोजकों के अनुसार इस आयोजन में सैकड़ों लोग प्रत्यक्ष रूप से जुड़े रहे, जिससे पुण्यतिथि समारोह ने शहर में एक बड़े सामाजिक और सांस्कृतिक आयोजन का रूप ले लिया।

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