बालाघाट जिले के बैहर और बिरसा क्षेत्र में बच्चों की मौतों का मामला सामने आने के बाद स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं। उपलब्ध रिपोर्ट के मुताबिक, इन दोनों ब्लॉकों में करीब एक महीने के दौरान 25 बच्चों की मौत होने की बात सामने आई है। रिपोर्ट में इन मामलों के पीछे मलेरिया, खसरा और कुपोषण जैसी समस्याओं का उल्लेख किया गया है। घटना ने स्थानीय स्वास्थ्य सेवाओं की निगरानी, बीमारी की समय पर पहचान और ग्रामीण इलाकों में उपलब्ध चिकित्सा सुविधाओं को लेकर चिंता बढ़ा दी है।
बैहर-बिरसा में मौतों के बाद स्वास्थ्य विभाग पर सवाल
बालाघाट लंबे समय से मलेरिया प्रभावित क्षेत्रों में शामिल रहा है। ऐसे में बच्चों में बुखार और दूसरी बीमारियों के मामलों की शुरुआती जांच बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। रिपोर्ट के अनुसार, बैहर और बिरसा में बच्चों की तबीयत बिगड़ने के बावजूद बीमारी की सही पहचान में देरी को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। स्थानीय स्तर पर बीमारी को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं होने के बाद भोपाल से स्वास्थ्य विभाग की टीम के पहुंचने का भी उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि यदि समय रहते फीवर सर्वे और जांच प्रभावी तरीके से होती, तो गंभीर स्थिति बनने से पहले उपचार उपलब्ध कराया जा सकता था।
रिपोर्ट में स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़े संसाधनों पर भी सवाल उठाए गए हैं। प्रदेश के स्वास्थ्य बजट और अस्पतालों में उपलब्ध सुविधाओं का उल्लेख करते हुए दावा किया गया है कि कई जगह अस्पताल और मशीनें तो मौजूद हैं, लेकिन डॉक्टरों और पैरामेडिकल कर्मचारियों की कमी बनी हुई है। बालाघाट में सामने आए मामलों ने ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच और उनकी प्रभावशीलता पर चर्चा तेज कर दी है।
टीकाकरण और बीमारी की रोकथाम को लेकर भी चर्चा
खसरे की रोकथाम के लिए टीकाकरण महत्वपूर्ण है। रिपोर्ट में राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आंकड़ों का हवाला देते हुए बालाघाट में खसरा-रोधी टीकाकरण का कवरेज 93 प्रतिशत बताया गया है। इसके बावजूद बच्चों में खसरे के मामलों और मौतों की खबर सामने आने से बीमारी की निगरानी और जमीनी स्तर पर स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति को लेकर सवाल उठ रहे हैं। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि पिछले वर्ष दिसंबर में माओवादी गतिविधियों से जुड़े अभियान के बाद क्षेत्र में विशेष टीकाकरण अभियान को लेकर सवाल उठाए गए हैं।
मलेरिया और खसरे के साथ कुपोषण को भी बच्चों की गंभीर स्थिति से जोड़कर देखा जा रहा है। ऐसे इलाकों में नियमित स्वास्थ्य जांच, बुखार की स्क्रीनिंग, टीकाकरण और समय पर इलाज बच्चों को गंभीर बीमारी से बचाने में अहम भूमिका निभाते हैं। यही वजह है कि सामने आए मामलों के बाद स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली और निगरानी व्यवस्था पर ध्यान केंद्रित हुआ है।
पूर्व विधायक ने लगाए गंभीर आरोप
बालाघाट के पूर्व विधायक किशोर समरीते ने दावा किया है कि जिले में खसरा, मलेरिया, पीलिया और दूषित पानी से जुड़ी समस्याओं के कारण 25 से अधिक बच्चों की मौत हुई है। उन्होंने पिछले छह महीनों में आदिवासी क्षेत्रों में 110 बच्चों की मौत का भी दावा किया है और आरोप लगाया है कि सरकार वास्तविक आंकड़े सार्वजनिक नहीं कर रही है। हालांकि, ये आंकड़े और आरोप उनके द्वारा किए गए दावों के रूप में सामने आए हैं, इसलिए इनकी स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।
समरीते ने आदिवासी समुदायों के विकास और संरक्षण के लिए केंद्र से मिले करीब 2,500 करोड़ रुपये के फंड के इस्तेमाल को लेकर भी सवाल उठाए हैं। उन्होंने इस राशि के खर्च का हिसाब सार्वजनिक करने की मांग की है। बालाघाट में बच्चों की मौत का यह मामला अब केवल स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि बीमारी की रोकथाम, सरकारी निगरानी, चिकित्सा स्टाफ और स्वास्थ्य योजनाओं के क्रियान्वयन को लेकर भी बहस का विषय बन गया है।










