मध्य प्रदेश में सड़क दुर्घटनाओं और हादसों में होने वाली मौतों को कम करने के लिए सरकार सड़क सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत करने की तैयारी में है। इसी दिशा में ‘जीरो फेटलिटी डिस्ट्रिक्ट’ कार्यक्रम का विस्तार करते हुए अब भोपाल, इंदौर और उज्जैन को भी इसमें शामिल किया जाएगा। योजना के तहत उन जगहों की पहचान की जाएगी, जहां लगातार दुर्घटनाएं हो रही हैं। इसके बाद हादसों के पीछे मौजूद कारणों का अध्ययन कर संबंधित विभागों के जरिए स्थायी सुधार कराने पर जोर रहेगा।
भोपाल, इंदौर और उज्जैन में लागू होगा कार्यक्रम
अभी प्रदेश के धार, सतना, रीवा, सागर, जबलपुर और खरगोन जिलों में जीरो फेटलिटी डिस्ट्रिक्ट कार्यक्रम चलाया जा रहा है। अब इसका दायरा बढ़ाकर तीन और बड़े जिलों को शामिल करने का फैसला लिया गया है। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य केवल दुर्घटना होने के बाद कार्रवाई करना नहीं, बल्कि दुर्घटना संभावित स्थानों और उनके कारणों को पहले से चिन्हित करके हादसों की पुनरावृत्ति रोकना है। किसी स्थान पर बार-बार दुर्घटना होने पर वहां सड़क की बनावट, यातायात व्यवस्था, वाहन चालकों की लापरवाही और अन्य परिस्थितियों की जांच के आधार पर सुधार किए जाएंगे।
सड़क सुरक्षा में ‘फोर ई’ मॉडल पर जोर
सड़क हादसों को कम करने के लिए इंजीनियरिंग, इमरजेंसी केयर, एनफोर्समेंट और एजुकेशन यानी ‘फोर ई’ को प्रमुख आधार बनाया जाएगा। जिन सड़कों या चौराहों पर दुर्घटनाओं का खतरा अधिक है, वहां जरूरी इंजीनियरिंग बदलाव किए जाएंगे। साथ ही यातायात नियमों का पालन कराने के लिए निगरानी और कार्रवाई बढ़ाने, दुर्घटना के बाद घायलों को जल्द चिकित्सा सहायता दिलाने तथा आम लोगों को सड़क सुरक्षा के प्रति जागरूक करने पर भी ध्यान दिया जाएगा।
हर दुर्घटना के कारण की होगी जांच
नई व्यवस्था में सड़क हादसे को केवल एक सामान्य घटना मानकर छोड़ने के बजाय उसके कारणों का व्यवस्थित रिकॉर्ड तैयार करने पर जोर रहेगा। हादसा किस स्थान पर हुआ, किस परिस्थिति में हुआ और उसमें कौन-कौन से कारण जिम्मेदार रहे, इसकी जानकारी जुटाई जाएगी। इसके आधार पर संबंधित विभाग को आवश्यक सुधार की जिम्मेदारी दी जाएगी। ब्लैक स्पॉट और बार-बार हादसे वाले क्षेत्रों में सड़क डिजाइन, संकेतक, ट्रैफिक नियंत्रण और अन्य सुरक्षा उपायों को बेहतर करने की योजना बनाई जाएगी।
पशुओं से होने वाले हादसों पर भी फोकस
सड़कों पर आवारा पशुओं के कारण होने वाली दुर्घटनाओं को रोकने के लिए स्थानीय स्तर पर लोगों की भागीदारी बढ़ाने का प्रस्ताव रखा गया है। इसके लिए स्थानीय समितियों के माध्यम से पशुओं को सड़कों से दूर रखने और संवेदनशील क्षेत्रों में निगरानी जैसी व्यवस्थाओं पर काम किया जा सकता है। इस समस्या के समाधान के लिए तत्काल उपायों के साथ लंबे समय की योजनाएं तैयार कर उन्हें तय समय में लागू करने पर भी जोर दिया जाएगा।
बिना बीमा वाले वाहनों पर लग सकती है ईंधन की रोक
प्रदेश में बिना बीमा चल रहे वाहनों की संख्या कम करने के लिए ‘बीमा नहीं तो ईंधन नहीं’ नाम से एक पायलट प्रोजेक्ट शुरू करने की तैयारी है। इसके लिए उस जिले को चुना जाएगा जहां गैर-बीमित वाहनों की संख्या सबसे ज्यादा है। प्रस्तावित व्यवस्था में पेट्रोल पंपों पर लगे कैमरों को वाहन संबंधी ऑनलाइन रिकॉर्ड से जोड़ने की योजना है। इससे वाहन की पहचान और बीमा स्थिति की जांच में मदद मिलेगी तथा पायलट स्तर पर बिना बीमा वाले वाहनों को ईंधन देने पर रोक लगाने की व्यवस्था का परीक्षण किया जाएगा।
छह महीने में सड़क हादसों में मौतों में आई कमी
बैठक में सामने आए आंकड़ों के अनुसार मध्य प्रदेश में हर साल सड़क दुर्घटनाओं में लगभग 13 हजार लोगों की जान जाती है। हालांकि 2026 के शुरुआती छह महीनों में पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले सड़क हादसों में होने वाली मौतों की संख्या में करीब 800 की कमी दर्ज की गई है। इसके बावजूद सड़क सुरक्षा व्यवस्था को और प्रभावी बनाने की जरूरत बताई गई है। दुर्घटना के बाद घायल व्यक्ति को जल्द अस्पताल पहुंचाना भी महत्वपूर्ण माना गया है। वर्तमान में शहरी इलाकों में हादसे के बाद घायल तक चिकित्सा सहायता पहुंचने में औसतन करीब 16 मिनट लगने की जानकारी दी गई, जिसे और कम करने का लक्ष्य रखा गया है।
नई योजना का व्यापक उद्देश्य दुर्घटना होने के बाद केवल राहत और कार्रवाई तक सीमित रहने के बजाय दुर्घटना के कारणों को खत्म करना है। यदि बार-बार हादसे वाले स्थानों की सही पहचान कर वहां सड़क, ट्रैफिक व्यवस्था, प्रवर्तन, चिकित्सा सहायता और जन-जागरूकता से जुड़े उपाय एक साथ लागू किए जाते हैं, तो सड़क दुर्घटनाओं और उनसे होने वाली मौतों में और कमी लाने में मदद मिल सकती है।










