सीजेआई सूर्यकांत बोले- न्याय तक पहुंच की पहली सीढ़ी है संवाद, सम्मान और समावेशन; इंदौर में कानूनी सहायता को लेकर देशभर के न्यायविदों का मंथन

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इंदौर। देश के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि आम नागरिक को न्याय दिलाने के लिए केवल कानूनी प्रावधान पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि उसके साथ संवाद करना, उसकी बात समझना और सम्मानजनक व्यवहार करना भी बेहद जरूरी है। उन्होंने कहा कि न्याय व्यवस्था का उद्देश्य ऐसा होना चाहिए कि जरूरतमंद व्यक्ति को न्याय के लिए भटकना न पड़े, बल्कि न्याय व्यवस्था खुद नागरिकों तक पहुंचने का प्रयास करे।

इंदौर में नेशनल लीगल सर्विसेस अथॉरिटी (नालसा) की दो दिवसीय वेस्ट जोन रीजनल कांफ्रेंस के शुभारंभ अवसर पर सीजेआई ने न्यायिक अधिकारियों और विधिक सेवा से जुड़े प्रतिनिधियों को संबोधित किया। कार्यक्रम में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और केंद्रीय विधि एवं न्याय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) अर्जुन मेघवाल भी मौजूद रहे। सम्मेलन में मध्य प्रदेश समेत महाराष्ट्र, राजस्थान, गुजरात और छत्तीसगढ़ के हाई कोर्ट के न्यायाधीशों के साथ विधिक सेवा प्राधिकरणों के पदाधिकारी और विशेषज्ञ शामिल हुए।

संवाद और सम्मान को बताया न्याय व्यवस्था की मजबूती

सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि भारत जैसे विविधता वाले देश में हर क्षेत्र और समुदाय की समस्याएं अलग हो सकती हैं। ऐसे में कानूनी सहायता का तरीका भी लोगों की स्थानीय परिस्थितियों और जरूरतों के अनुरूप होना चाहिए। उन्होंने कहा कि किसी परेशान व्यक्ति से उसकी भाषा और परिस्थिति को समझते हुए सम्मानपूर्वक बातचीत की जाए तो उसके मन का डर और संकोच काफी हद तक कम किया जा सकता है। इससे न्यायिक संस्थाओं के प्रति लोगों का भरोसा भी मजबूत होता है।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि संवाद, गरिमा और समावेशन केवल औपचारिक शब्द नहीं हैं, बल्कि प्रभावी कानूनी सहायता व्यवस्था की बुनियाद हैं। संस्थाओं को सिर्फ लोगों को उनके अधिकारों की जानकारी देने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि जिन समुदायों के लिए योजनाएं और सेवाएं बनाई जा रही हैं, उनकी वास्तविक समस्याओं को सुनकर उनसे सीखना भी जरूरी है।

अलग-अलग समुदायों के लिए समाधान भी अलग होने चाहिए

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि देश के अलग-अलग हिस्सों में रहने वाले लोगों की परिस्थितियां एक जैसी नहीं होतीं। आदिवासी परिवारों, मछुआरा समुदाय, प्रवासी श्रमिकों और कानूनी सहायता की जरूरत वाली महिलाओं की समस्याओं का स्वरूप अलग हो सकता है। इसलिए सभी के लिए एक जैसा समाधान लागू करने के बजाय स्थानीय जरूरतों को समझकर कानूनी सहायता उपलब्ध कराना ज्यादा प्रभावी होगा।

उन्होंने जोर दिया कि कानूनी सहायता मांगने वाला व्यक्ति केवल एक आवेदन लेकर नहीं आता, बल्कि वह अपनी वास्तविक समस्या और उम्मीद लेकर संस्था तक पहुंचता है। ऐसे में उसकी बात ध्यान से सुनना और परिस्थिति को समझना न्याय व्यवस्था की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।

न्याय नागरिकों तक पहुंचाने पर जोर

सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिसमें लोगों को न्याय पाने के लिए अनावश्यक कठिनाइयों का सामना न करना पड़े। उन्होंने इस विचार पर जोर दिया कि न्याय को नागरिकों के करीब ले जाने की जरूरत है। उनके अनुसार, कानूनी सहायता की सार्थकता तभी है जब जरूरतमंद व्यक्ति की बात सुनी जाए और उसे उसकी परिस्थिति के मुताबिक उचित मार्गदर्शन और सहायता मिल सके।

कांफ्रेंस में न्याय तक पहुंच को आसान बनाने के साथ मध्यस्थता, आदिवासी समुदायों के कानूनी सशक्तीकरण, बंदियों को विधिक सहायता और बच्चों के लिए अनुकूल न्याय व्यवस्था जैसे विषयों पर भी चर्चा की जा रही है। दो दिवसीय आयोजन में न्याय व्यवस्था को अधिक संवेदनशील और जनसुलभ बनाने के विभिन्न पहलुओं पर विचार-विमर्श किया जा रहा है।

मुख्यमंत्री ने अहिल्याबाई होल्कर के न्याय का किया उल्लेख

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने अपने संबोधन में इंदौर और मालवा क्षेत्र की न्याय परंपरा का उल्लेख करते हुए अहिल्याबाई होल्कर का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि अहिल्याबाई के शासन में न्याय को सर्वोच्च महत्व दिया गया और प्रजा के साथ समान व्यवहार की भावना दिखाई गई। मुख्यमंत्री ने कहा कि देश में न्याय व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए, जिसमें हर व्यक्ति को समय पर और समान रूप से न्याय हासिल करने का अवसर मिले।

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