MP के 15 लाख कर्मचारियों और पेंशनरों को हेल्थ इंश्योरेंस का इंतजार, 2019 से लंबित योजना लागू करने की मांग तेज

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भोपाल। मध्य प्रदेश के सरकारी कर्मचारियों और पेंशनरों के लिए प्रस्तावित चिकित्सा बीमा योजना लंबे समय से चर्चा में है, लेकिन अभी तक इसे प्रदेश में लागू नहीं किया जा सका है। वर्ष 2019 से चल रही इस प्रक्रिया को लेकर कर्मचारी संगठनों ने एक बार फिर सरकार से जल्द फैसला लेने की मांग की है। कर्मचारियों का कहना है कि योजना का मॉडल चाहे जैसा तय किया जाए, अब इसे लागू करने की दिशा में ठोस कदम उठाया जाना चाहिए।

लंबे समय से अटकी है चिकित्सा बीमा योजना

कर्मचारी संगठनों के अनुसार प्रदेश में सरकारी कर्मचारियों और पेंशनरों के लिए हेल्थ इंश्योरेंस की व्यवस्था शुरू करने का प्रस्ताव कई साल पहले तैयार किया गया था। इस संबंध में कर्मचारी संगठनों से सुझाव भी लिए गए, लेकिन योजना अभी तक अमल में नहीं आ पाई है। प्रस्तावित व्यवस्था में बीमा का प्रीमियम कर्मचारियों के वेतन और पेंशनरों की पेंशन से काटे जाने की बात सामने आई है, जबकि इलाज से जुड़े स्वीकृत दावों का भुगतान बीमा व्यवस्था के तहत किया जाना प्रस्तावित है।

पुलिस विभाग की तर्ज पर मॉडल लागू करने की मांग

कर्मचारी संगठनों ने मध्य प्रदेश पुलिस में लागू चिकित्सा बीमा व्यवस्था को उदाहरण के तौर पर सामने रखा है। उनका कहना है कि पुलिस कर्मियों के लिए पहले से चल रही व्यवस्था में कम मासिक प्रीमियम के बदले स्वास्थ्य बीमा कवर उपलब्ध कराया जाता है। इसी तरह की व्यवस्था को प्रदेश के अन्य सरकारी कर्मचारियों और पेंशनरों के लिए भी अपनाने पर विचार किया जा सकता है।

मंत्रालय अधिकारी-कर्मचारी संघ का तर्क है कि यदि पुलिस विभाग की व्यवस्था से कम लागत में बीमा सुविधा उपलब्ध कराई जा सकती है, तो उसी तरह का मॉडल व्यापक स्तर पर लागू करने की संभावना देखी जानी चाहिए। कर्मचारी संगठनों का कहना है कि अब योजना के स्वरूप को लेकर लंबे समय तक चर्चा करने के बजाय इसे लागू करने की दिशा में निर्णय लिया जाना जरूरी है।

सरकार पर अतिरिक्त बोझ को लेकर क्या है तर्क?

कर्मचारी संगठनों का कहना है कि अंशदायी व्यवस्था होने के कारण योजना के लिए कर्मचारियों और पेंशनरों से निर्धारित प्रीमियम लिया जा सकता है। ऐसे में सरकार पर सीधे तौर पर अतिरिक्त वित्तीय दबाव कम किया जा सकता है। उनका मानना है कि बड़ी संख्या में कर्मचारियों और पेंशनरों के शामिल होने से योजना का दायरा भी व्यापक होगा और भविष्य में इसका आर्थिक मॉडल अधिक मजबूत हो सकता है।

हालांकि, ऐसी किसी भी बीमा व्यवस्था में अस्पतालों और इलाज से जुड़े दावों की निगरानी को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कर्मचारी संगठनों का कहना है कि फर्जी बिल, गलत दावे या जरूरत से ज्यादा राशि के दावों पर प्रभावी निगरानी के लिए मजबूत व्यवस्था बनाई जानी चाहिए, ताकि योजना का पैसा अनावश्यक रूप से खर्च न हो।

कर्मचारियों को अब सरकार के फैसले का इंतजार

प्रदेश के कर्मचारी और पेंशनर संगठन चाहते हैं कि सरकार लंबित चिकित्सा बीमा योजना पर जल्द अंतिम निर्णय ले। उनका कहना है कि कर्मचारियों के लिए स्वास्थ्य सुरक्षा से जुड़ी सुविधा लंबे समय से प्रस्तावित है और अब इसे कागजों से बाहर निकालकर वास्तविक रूप में लागू किया जाना चाहिए। पुलिस विभाग के मौजूदा मॉडल समेत दूसरे विकल्पों का अध्ययन करके सरकार ऐसा मॉडल तैयार कर सकती है, जिसमें कर्मचारियों को पर्याप्त स्वास्थ्य सुरक्षा मिले और योजना का वित्तीय प्रबंधन भी प्रभावी तरीके से हो सके।

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