भोपाल। जिस पिता ने अपनी पूरी जिंदगी बच्चों की परवरिश और परिवार का भविष्य संवारने में लगा दी, जीवन के आखिरी दिनों में उन्हें अपनों से दूर वृद्धाश्रम में रहना पड़ा। सबसे ज्यादा भावुक करने वाली बात यह रही कि निधन के बाद भी परिवार का कोई सदस्य उन्हें अंतिम विदाई देने नहीं पहुंचा। भोपाल के एक वृद्धाश्रम में करीब 70 वर्ष के बुजुर्ग की मौत के बाद उनका शव लगभग दो दिनों तक परिजनों के आने की उम्मीद में रखा रहा। जब परिवार की ओर से अंतिम संस्कार के लिए आने में असमर्थता जताई गई, तब पुलिस की मदद से बुजुर्ग का अंतिम संस्कार कराया गया।
परिजनों से संपर्क के बावजूद नहीं पहुंचे परिवार के लोग
आश्रम संचालिका माधुरी मिश्रा के अनुसार बुजुर्ग की मृत्यु 4 अगस्त 2026 को हुई थी। निधन के बाद आश्रम की ओर से परिवार से संपर्क करने की लगातार कोशिश की गई। आश्रम प्रबंधन चाहता था कि बुजुर्ग के अंतिम संस्कार में उनके अपने लोग शामिल हों, इसलिए तत्काल अंतिम संस्कार करने के बजाय दो दिन तक परिजनों का इंतजार किया गया।
आश्रम संचालिका ने बताया कि परिवार के सदस्यों से बातचीत के दौरान किसी ने आने में असमर्थता जताई तो किसी ने यात्रा से जुड़ी परेशानियों का हवाला दिया। इस दौरान आश्रम की ओर से शव को सुरक्षित रखने की भी कोशिश की गई, हालांकि वहां लंबे समय तक शव रखने के लिए पर्याप्त व्यवस्था उपलब्ध नहीं थी। पुलिस को मामले की जानकारी पहले ही दे दी गई थी। आखिरकार जब परिवार की ओर से कोई नहीं आया तो पुलिस के सहयोग से अंतिम संस्कार की प्रक्रिया पूरी की गई।
संपत्ति को लेकर परिवार में विवाद की बात सामने आई
परिजनों से बातचीत के दौरान परिवार के भीतर संपत्ति को लेकर विवाद की बात भी सामने आई। बताया गया कि बुजुर्ग ने अपनी संपत्ति अपने बेटे को दे दी थी, जिसके कारण बेटी और बेटे के बीच संबंध ठीक नहीं थे। बेटी ने अंतिम संस्कार में शामिल होने से इनकार करते हुए संपत्ति से जुड़े अपने पक्ष का हवाला दिया।
आश्रम प्रबंधन के मुताबिक बेटे से भी संपर्क किया गया, लेकिन उसने भी भोपाल आने में असमर्थता जताई। परिवार की ओर से बाद में बुजुर्ग के डेथ सर्टिफिकेट को लेकर आश्रम से संपर्क किया गया। इस पर आश्रम संचालिका ने नाराजगी जाहिर की और कहा कि जब अंतिम समय में परिवार का कोई सदस्य साथ खड़ा नहीं हुआ तो केवल मृत्यु प्रमाण पत्र के लिए आश्रम पर निर्भर रहना उचित नहीं है।
मेहनत कर बच्चों को बड़ा किया, आखिरी वक्त में आश्रम बना सहारा
आश्रम की जानकारी के मुताबिक बुजुर्ग घनश्याम जी साइकिल के टायर और ट्यूब का थोक कारोबार करते थे। उन्होंने अपने जीवन में काफी मेहनत की और अपने चार बच्चों की परवरिश की। परिवार में दो बेटे और दो बेटियां हैं। बताया गया कि उन्होंने जीवनभर कमाई कर जो संपत्ति और साधन जुटाए, उन्हें बच्चों के बीच बांट दिया था।
उम्र बढ़ने के साथ परिस्थितियां बदलती गईं और जीवन के अंतिम वर्षों में उन्हें वृद्धाश्रम का सहारा लेना पड़ा। आश्रम संचालिका का कहना है कि बुजुर्ग अक्सर अपने बच्चों के लिए किए गए संघर्ष और परिवार को लेकर अपनी पुरानी यादें साझा करते थे। लेकिन निधन के बाद उनके अंतिम समय में परिवार का साथ नहीं मिलना बेहद दुखद रहा।
बुजुर्गों की देखभाल में आश्रमों के सामने बड़ी चुनौती
वृद्धाश्रम प्रबंधन के सामने ऐसी परिस्थितियों में सबसे बड़ी परेशानी शव को सुरक्षित रखना और परिजनों तक पहुंचना होती है। कई बुजुर्ग आश्रम में दाखिले के समय ऐसे नंबर देते हैं जो उनके रिश्तेदारों के बजाय किसी परिचित या पुराने संपर्क के होते हैं। कई बार दिए गए नंबर बंद हो जाते हैं या परिवार के लोग संपर्क में आने से बचते हैं।
माधुरी मिश्रा का कहना है कि पिछले करीब तीन दशकों से वह बुजुर्गों की सेवा से जुड़ी हैं और इस दौरान उन्होंने कई ऐसे मामले देखे हैं, जहां परिवार ने बुजुर्ग माता-पिता को आश्रम में छोड़ने के बाद उनकी सुध तक नहीं ली। कुछ बुजुर्गों को अपने बच्चों का वर्तमान पता तक नहीं मालूम होता। दस्तावेजों की कमी भी कई बार उनकी पहचान और परिवार को तलाशने में मुश्किल पैदा करती है।
परिवार की जिम्मेदारी और बुजुर्गों की स्थिति पर उठे सवाल
आश्रम संचालिका के अनुसार समाज में बुजुर्गों के प्रति संवेदनशीलता को लेकर गंभीर चिंता की जरूरत है। उनका कहना है कि हर परिवार ऐसा नहीं होता और बहुत से बच्चे अपने माता-पिता की पूरी जिम्मेदारी निभाते हैं, लेकिन कुछ मामलों में बुजुर्गों को अकेला छोड़ दिया जाता है।
उन्होंने अपने अनुभव के आधार पर बताया कि कई बार बुजुर्गों को सार्वजनिक स्थानों पर छोड़ने या उनसे आर्थिक लाभ लेने जैसी स्थितियां भी सामने आती हैं। कुछ मामलों में बुजुर्गों ने परिवार की ओर से उपेक्षा और दुर्व्यवहार की शिकायत भी की है। ऐसे मामलों से यह सवाल उठता है कि जिन माता-पिता ने अपने बच्चों को जीवनभर संभाला, उनके जीवन के आखिरी दौर में परिवार और समाज की जिम्मेदारी क्या होनी चाहिए।
माधुरी मिश्रा के मुताबिक उनके सामने पिछले 30 वर्षों में ऐसे कई मामले आए हैं। इनमें कुछ बुजुर्गों को परिवार छोड़ गया, तो कुछ खराब परिस्थितियों में भटकते हुए आश्रम तक पहुंचे। एक बुजुर्ग कई दिनों तक हबीबगंज स्टेशन के आसपास जीवन गुजारने को मजबूर रहे थे। बाद में सामाजिक कार्यकर्ताओं की मदद से उन्हें आश्रम लाया गया, जहां उन्होंने कई वर्षों तक शरण ली।
बुजुर्गों से जुड़े ऐसे मामले सिर्फ एक परिवार की कहानी नहीं हैं, बल्कि बदलते सामाजिक रिश्तों पर भी सवाल खड़े करते हैं। उम्र के उस पड़ाव पर जब व्यक्ति को सबसे ज्यादा अपनेपन और सहारे की जरूरत होती है, तब उसका अकेला पड़ जाना समाज के लिए गंभीर चिंता का विषय है।










