इंदौर। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने मकान खाली कराने से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मकान मालिक को अपने परिवार की जरूरत के हिसाब से यह तय करने का अधिकार है कि उसे किस शहर में रहना सुविधाजनक लगता है। इस फैसले में कोर्ट ने कहा कि किराएदार यह तय नहीं कर सकता कि मकान मालिक के लिए किसी दूसरे शहर में रहना जरूरी है या नहीं।
परिवार की जरूरत को कोर्ट ने माना अहम
मामला इंदौर के खजराना क्षेत्र स्थित एक मकान से जुड़ा है। मकान मालिक की ओर से अदालत में बताया गया कि परिवार की परिस्थितियों को देखते हुए उन्हें इंदौर में रहने के लिए मकान की आवश्यकता है। परिवार में एक सदस्य स्वास्थ्य संबंधी परेशानी से जूझ रहा है और सेवानिवृत्ति की स्थिति भी सामने है। वहीं, बड़े बेटे की पढ़ाई और छोटे बेटे के भविष्य की शिक्षा को देखते हुए इंदौर में रहने की जरूरत बताई गई थी।
मकान मालिक के अनुसार, बड़ा बेटा कंपनी सेक्रेटरी की पढ़ाई कर रहा है और इंदौर में रहकर अपनी पढ़ाई जारी रखना चाहता है। छोटे बेटे ने भी 12वीं के बाद इंजीनियरिंग की पढ़ाई इंदौर से करने की इच्छा जताई थी। इन्हीं परिस्थितियों के आधार पर मकान मालिक ने मकान खाली कराने की मांग की थी।
किराएदार ने दी अलग दलील
किराएदार की ओर से मकान खाली कराने की मांग का विरोध किया गया। उसका कहना था कि वह लंबे समय से मकान में रह रहा है और किराए का नियमित भुगतान करता आ रहा है। किराए की राशि को लेकर भी अदालत के सामने पक्ष रखा गया। किराएदार ने यह तर्क दिया कि मकान मालिक के बेटे की पढ़ाई के लिए इंदौर में रहना अनिवार्य होने का कोई ठोस प्रमाण नहीं है और मकान खाली कराने की वास्तविक जरूरत साबित नहीं होती।
इस मामले में पहले विचारण न्यायालय ने मकान मालिक की आवश्यकता को उचित मानते हुए किराएदार को मकान खाली करने का आदेश दिया था। इसके बाद किराएदार ने इस फैसले को चुनौती दी और मामला हाई कोर्ट तक पहुंचा।
हाई कोर्ट ने क्या कहा
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने किराएदार की दलीलों को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति या उसके परिवार के लिए कौन-सी जगह रहने और शिक्षा जैसी जरूरतों के लिहाज से बेहतर है, इसका फैसला संबंधित परिवार ही कर सकता है। किराएदार से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह मकान मालिक की व्यक्तिगत जरूरतों या शहर के चुनाव को सही या गलत ठहराए।
कोर्ट ने इसी आधार पर किराएदार की अपील को खारिज कर दिया और मकान मालिक के पक्ष में पहले दिए गए आदेश को बरकरार रखा। इस फैसले से यह बात सामने आती है कि यदि मकान मालिक अपनी वास्तविक आवश्यकता अदालत के सामने उचित तरीके से स्थापित कर देता है, तो उसकी पारिवारिक परिस्थितियों और रहने की पसंद को केवल किराएदार की आपत्ति के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता।










